गौरैया
कभी सुबह की शुरुआत उसकी चहचहाहट से होती थी वो छोटी सी गौरैया, जो हमारे आंगन की पहचान हुआ करती थी।
आज वही आवाज़ धीरे-धीरे खामोश हो रही है और हम बस देख रहे हैं …
गौरैया का खत्म होना सिर्फ एक पक्षी का खो जाना नहीं है,
ये हमारी प्रकृति, हमारे बचपन और हमारी संवेदनाओं का खो जाना है।
गौरैया सिर्फ चहकने वाली चिड़िया नहीं है बल्कि यह खेतों और बगीचों में हानिकारक कीड़ों को खाकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखती है
यह पर्यावरण की सेहत का संकेत है जहाँ गौरैया नहीं, वहाँ कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है
यह हमारे जीवन से जुड़ी सादगी, अपनापन और प्रकृति के साथ रिश्ता दर्शाती है
आज मोबाइल टावर, कंक्रीट के जंगल, और कीटनाशकों ने उसकी दुनिया छीन ली है
पर अभी भी वक्त है अगर हम चाहें, तो उसे वापस बुला सकते हैं।
हम सभी को अपने अपने घर की छत या बालकनी में पानी और दाना रखना चाहिए
छोटे-छोटे घोंसले (Nest Box) लगाना चाहिए और पेड़-पौधे लगाएं और बचाएं
कीटनाशकों का कम से कम उपयोग करें
जब गौरैया बची रहेगी, तो ही प्रकृति मुस्कुराती रहेगी…
और अगर वो चली गई तो हमारी आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में उसे ढूंढेंगी।
आज हम सब एक छोटा सा कदम उठाएं ताकि फिर से हमारे आंगन में गौरैया चहके और जिंदगी फिर से महके।
Comments
Post a Comment